भले ही देश के भीतर की छोटी-छोटी जागीरें समाप्त कर दी गई हों किन्तु ग्लोबल प्लैटफार्म पर भारत की हैसियत एक जागीर जैसी ही है। हो सकता है इस जागीर की रेटिंग अच्छी हो। यहां पहाड़ और वादियां हों, धन धान्य से परिपूर्ण मैदानी इलाके हों, सस्ता ह्यूमन रिसोर्स, रंगबिरंगी लोकसंस्कृति हो किन्तु इस सबके बावजूद इसकी हैसियत जागीर की ही है। शहंशाह तो अमेरिका है। सबकुछ उसके खुश रहने पर निर्भर करता है। इसलिए अपनी जागीर में कुछ सुधार करने के बाद जब भारत का जागीरदार अमेरिका पहुंचकर उसकी राजी-खुशी पूछता है तो वह एक बार उसके पुट्ठे सेंक कर वापस भेज देता है कि जाओ और ‘यह’ करके आओ। तुमने जो कुछ किया वह ठीक है, पर यही सबकुछ नहीं है। हम खुश नहीं हैं। मजा नहीं आया।
यह एक विडम्बना ही है कि भले ही सैनिकों की शहादतों पर हमारी पलकें आज भी नम होती हों, क्रिकेट में जीत की हमें खुशी होती हो किन्तु हकीकत में हमारे मन में देश का कंसेप्ट ही क्लीयर नहीं है। देश की आधी से ज्यादा आबादी युवाओं की है। स्मार्ट फोन, स्मार्ट ड्रेस, स्मार्ट फूड और स्मार्ट लाइफस्टाइल के शौकीन ये युवा सबसे आगे रहना चाहते हैं। इन्हें नई तकनीक भाती है। ये बेहतर लाइफ स्टाइल चाहते हैं। मौका मिले तो इनमें से अधिकांश अमेरिका, यूरोप या आस्ट्रेलिया में नौकरी करना चाहते हैं। देश की बुरी हालत को लेकर इनमें आक्रोश है। वे कहते हैं, यहां कुछ भी ठीक नहीं है। सड़कों पर गड्ढे और स्पीडब्रेकर हैं। ट्रैफिक का माईबाप नहीं है। नौकरी में अच्छा वेतन नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। वे चाहते हैं कि व्यवस्था बदले। परिवर्तन की इसी आस में वे कभी अन्ना हजारे, कभी केजरीवाल तो कभी मोदी के पीछे भागते हैं।
और सिर्फ युवा ही क्यों, न्यूनतम पर जीवन जीने का प्रवचन सुनने वाले प्रौढ़ भी इस दौड़ में शामिल हैं। जरा उनके महल देखिए, उनकी गाड़ियां देखिए, उनके दफ्तर देखिए। पैसों की उनकी भूख देखिए। वे एक साथ कई पीढ़ियों के लिए कमा लेना चाहते हैं। अदृश्य कीड़े-मकोड़ों तक की चिंता करने वाले लोग इंसानों की लाशों पर चलना चाहते हैं। परोपकार के लिए दानपेटियां हैं ना। टैक्स रिबेट भी मिलता है। कुछ साधु संतों महात्माओं की सेवा कर लो, साल में दो चार प्रवचनों को स्पांसर कर दो। इतना काफी है।
ऐसे विचित्र देश में जब केएफसी, अंकल चिप्स का मुकाबला बाबा रामदेव काढ़ा और कुल्थी से करना चाहते हैं, और वे लोकप्रिय भी होते हैं तो मामला दिलचस्प हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हिन्दी की दुहाई देने वालों के बच्चे विदेश जाकर अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन सीखते हैं। पब में दारू पीते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हैं। देश में बेकार की बहस होती रहती है और वे उसे भी स्पांसर करते रहते हैं।
यह एक विडम्बना ही है कि भले ही सैनिकों की शहादतों पर हमारी पलकें आज भी नम होती हों, क्रिकेट में जीत की हमें खुशी होती हो किन्तु हकीकत में हमारे मन में देश का कंसेप्ट ही क्लीयर नहीं है। देश की आधी से ज्यादा आबादी युवाओं की है। स्मार्ट फोन, स्मार्ट ड्रेस, स्मार्ट फूड और स्मार्ट लाइफस्टाइल के शौकीन ये युवा सबसे आगे रहना चाहते हैं। इन्हें नई तकनीक भाती है। ये बेहतर लाइफ स्टाइल चाहते हैं। मौका मिले तो इनमें से अधिकांश अमेरिका, यूरोप या आस्ट्रेलिया में नौकरी करना चाहते हैं। देश की बुरी हालत को लेकर इनमें आक्रोश है। वे कहते हैं, यहां कुछ भी ठीक नहीं है। सड़कों पर गड्ढे और स्पीडब्रेकर हैं। ट्रैफिक का माईबाप नहीं है। नौकरी में अच्छा वेतन नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। वे चाहते हैं कि व्यवस्था बदले। परिवर्तन की इसी आस में वे कभी अन्ना हजारे, कभी केजरीवाल तो कभी मोदी के पीछे भागते हैं।
और सिर्फ युवा ही क्यों, न्यूनतम पर जीवन जीने का प्रवचन सुनने वाले प्रौढ़ भी इस दौड़ में शामिल हैं। जरा उनके महल देखिए, उनकी गाड़ियां देखिए, उनके दफ्तर देखिए। पैसों की उनकी भूख देखिए। वे एक साथ कई पीढ़ियों के लिए कमा लेना चाहते हैं। अदृश्य कीड़े-मकोड़ों तक की चिंता करने वाले लोग इंसानों की लाशों पर चलना चाहते हैं। परोपकार के लिए दानपेटियां हैं ना। टैक्स रिबेट भी मिलता है। कुछ साधु संतों महात्माओं की सेवा कर लो, साल में दो चार प्रवचनों को स्पांसर कर दो। इतना काफी है।
ऐसे विचित्र देश में जब केएफसी, अंकल चिप्स का मुकाबला बाबा रामदेव काढ़ा और कुल्थी से करना चाहते हैं, और वे लोकप्रिय भी होते हैं तो मामला दिलचस्प हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हिन्दी की दुहाई देने वालों के बच्चे विदेश जाकर अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन सीखते हैं। पब में दारू पीते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हैं। देश में बेकार की बहस होती रहती है और वे उसे भी स्पांसर करते रहते हैं।

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