Saturday, 31 August 2013

चुनाव क्यों नहीं लड़ लेते आसाराम

आसाराम पर लगे यौनाचार के आरोप के बाद एक बात तो साफ हो गया है कि आसाराम के प्रति उनके समर्थकों और अनुयायियों की आस्था सौ टका टंच है। वे उनके खिलाफ कुछ भी नहीं सुन सकते। वे उनके लिए जान देने को भी तैयार हैं। यह सिर्फ समर्थन नहीं बल्कि आस्था का मामला है। आस्थावान तो पत्थरों और झंडों की हिफाजत के लिए जान की बाजी लगा देते हैं और फिर यहां तो सवाल जीते जागते इंसान का है। सफेद दाढ़ी और सफेद चोगे का है। बहरहाल हम यहां इस बहस में नहीं उलझना चाहते कि आसाराम दोषी हैं या नहीं। हम घटना से प्रत्यक्ष जुड़े हुए नहीं हैं। हम जांच एजेंसी भी नहीं हैं। जितना जानते हैं वह पढ़ा-सुना है। हम तो सिर्फ इतना जानते हैं कि दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक व्यक्ति बेगुनाह है। आसाराम भी। हां! यहां यह टिप्पणी जरूर करना चाहेंगे कि आसाराम जैसे स्थापित लोगों को अपनी दिनचर्या में कुछ और सावधानियां बरतनी चाहिए।
यह बहस एक तरफ, इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह है कि आसाराम के चाहने वालों ने पूरे देश भर में रैलियां निकलीं। गली-गली में बहस हो रही है और बापू से जुड़े लोग आरोपों का प्रबल विरोध कर रहे हैं। जब पुलिस आश्रम पहुंची तो आसाराम को बचाने के लिए ये पुलिस की राह में ही लेट गए। आसाराम का भी पुतला जला-ठीक वैसे ही जैसे दूसरे नेताओं का जलता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा खानदानी कांग्रेसी कांग्रेस की आलोचना नहीं सहता, भाजपाई और संघी भाजपा की बुराई नहीं सुनते।
इससे यह सवाल उभरता है कि क्या आसाराम में नेतागिरी का पोटेंशल है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। यदि आसाराम नेता बन जाते हैं तो वे विधानसभा और लोकसभा तक पहुंच सकते हैं। वहां ऐसे कानून बना सकते हैं जिससे बुजुर्गों को भी नाबालिगों जैसा दूधभात मिले। उम्मीद है कि इसमें सभी दल साथ देंगे। ऐसा कानून बन गया तो एनडी, राघव जैसे लोग भी फजीहत से बच जाएंगे।

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