Tuesday, 2 July 2013

10,000 Dead, मोगाम्बो खुश हुआ

उत्तराखंड में बादल फटने एवं भारी वर्षा के कारण आई बाढ़ के बाद एक तरफ जहां सेना और राष्ट्रीय आपदा बचाव बल (एनडीआरएफ) किसी तरह लोगों की जान बचाने की कोशिश में लगे हैं वहीं देश की मीडिया और राजनीतिज्ञ मृतकों के आंकड़ों को लेकर राजनीति में उलझे पड़े हैं। सभी को एक बड़ा आंकड़ा चाहिए था जिसे लेकर वे केन्द्र और उत्तराखंड की सरकार पर हमला कर सकें। यह मौका न तो गृहमंत्री शिंदे दे रहे थे और न ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बहुगुणा। शनिवार को लोगों की यह हसरत भी पूरी हो गई। उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष ने 10,000 लोगों के मरने की संभावना क्या जताई, मोगांबो खुश हो गया। यह कोई सरकारी आंकड़ा नहीं था। विधानसभा अध्यक्ष के पास आंकड़े प्राप्त करने का कोई अलग जरिया भी नहीं है। फिर भी यह आंकड़ा महत्वपूर्ण हो गया और इसे खूब उछाला गया।   वैसे भी इस आंकड़े का अर्थ क्या है। यह सभी जानते हैं कि जिस स्थान से 13 दिन चले अभियान में एक लाख से अधिक तीर्थयात्रियों को निकाला गया है वहां मरने वालों की संख्या 10 हजार, 15 हजार, 20 हजार कुछ भी हो सकती है। लाशें वहां से दर्जनों किलोमीटर दूर गंगा में तैरती मिली हैं। पर इसका कोई सटीक आंकड़ा अभी किसी के पास नहीं है। एनडीआरएफ द्वारा जारी आंकड़ा भी सच के करीब ही होगा, पूरा सच नहीं। नेताओं के आंकड़ों का क्या? वे तो भरा मैदान देखकर कभी 50 हजार तो कभी एक लाख लोगों की भीड़ जुटने का आकलन कर लेते हैं।
अब आते हैं इस बात पर कि इतनी कोफ्त क्यों? कोफ्त इसलिए कि 10 हजार मौतों के आंकड़े ने कई बातों को दबा दिया। इसमें यह दब गया कि किस तरह हिन्दुस्तानी अपने ही देश के जख्मी, मरणासन्न और मृतकों को लूटते रहे। किस तरह भारतीय व्यापारियों ने अपने ही देश के लोगों को मौका देखकर ऊंची कीमतों पर जिंसें बेचीं। धर्मकर्म का सारा ठेका अपने पास सुरक्षित रखने वाले पंडितों ने किस तरह मृतकों के अंतिम संस्कार से खुद को दूर कर लिया। वह तो सेना के पास भी पंडित होते हैं, लिहाजा अंतिम संस्कार बिना किसी पंडे-पुरोहित के ही होते रहे।
एक और बात जो दब गई वह यह थी कि जिन पहाड़ों पर हमारे जैसे समतल के रहने वाले अपना बोझ नहीं उठा पाते, सिंगल हड्डी डेढ़-पसली के लोग तीन-तीन चार-चार भारी बैग लेकर क्या करने गए थे। राहत एवं बचाव कार्यों की तस्वीरें देखिए तो खुद ही समझ में आ जाएगा कि सेना और एनडीआरएफ अपनी जान को जोखिम में डालकर बच्चे, बूढ़े और जवानों को अपनी पीठ पर किस तरह सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहे हैं। कुछ तस्वीरों में तो जवानों को तीर्थयात्रियों का बस्ता तक ढोते दिखाया गया है। जवानों ने जितने लोगों को ढोया उससे कहीं अधिक उनका बस्ता ढोया।
अपने छत्तीसगढ़ को ही ले लीजिए। नगर पालिकाएं और निगम अपने अपने क्षेत्र में बहुमंजिली इमारतों का लाइसेंस बांट रहे हैं। पर इनमें से किसी के भी पास कोई ढंग का अग्निशमन या बचाव दल नहीं है। यदि कभी खुदा न खास्ता इनमें से किसी इमारत के निचले तल में आ लग गई तो ऊपर के मंजिल वालों को कूद कर ही अपनी जान बचानी या गंवानी पड़ेगी। हम आफत और आपदा की तैयारी नहीं करते बल्कि सुबह पूजा कर तिलक लगा कर घर से निकलते हैं। और तो और हेलमेट के प्रति जागरूकता लाने के लिए निकलने वाली रैलियों में भी लोग बिना हेलमेट के ही दिखाई पड़ते हैं।

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