Saturday, 31 August 2013

पौने अठारह साल का बच्चा

भारत में 17 साल 11 महीने और 29 दिन की उम्र तक कुछ भी करने की छूट है। चाहे तो किसी का रेप कर दे, चाहे किसी का अंगभंग कर दे, चाहे किसी की हत्या कर दे, तेजाब डालकर किसी को जला दे, उसे सजा नहीं दी जा सकती। इसलिए नहीं दी जा सकती क्योंकि वह अभी बालिग नहीं हुआ। वह बच्चा है। उसमें फैसले लेने की क्षमता नहीं है। उसकी फैसला लेने की क्षमता इस अवधि के ठीक एक दिन बाद रातों-रात पैदा हो जाती है। यह कैसा ऊलजलूल कानून है कि एक दिन के अंतराल में व्यक्ति की पूरी परिभाषा बदल जाती है। आखिर हम स्वविवेक का उपयोग किस बात के लिए बांध कर अलग रखे हुए हैं?
कानून लोगों को अपराधों से रोकने तथा पीड़ितों को न्याय का अहसास कराने के लिए होता है। कानून किसी का खोया हुआ जीवन तो नहीं लौटा सकता किन्तु पीड़ित को इस बात का संतोष जरूर दिलाता है कि देश में कानून का राज है। वह अकेला और असहाय नहीं है। देश को उसके साथ पूरी सहानुभूति है। इसके साथ ही कानून पीड़ित को हुए नुकसान के एक अंश की भौतिक क्षतिपूर्ति का भी प्रयास करता है।
पर दिल्ली गैंग रेप केस में ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिसने यह जघन्य अपराध किया, सजा सुनाए जाने के बाद उसने राहत की सांस ली है। उसे सिर्फ तीन साल की सजा हुई है जिसकी गिनती उस दिन से शुरू होगी जिस दिन उसे सुधार गृह भेजा गया। घटना पिछले साल दिसम्बर की है। यानी उसकी सजा दो साल में पूरी हो जाएगी। जिसके साथ यह सब हुआ वह आज का यह दिन देखने के लिए जीवित नहीं है। उसका रोता बिलखता परिवार खुद को बेहद असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यदि कानून का यह मतलब है तो कानून बनाने वालों और कानून का पालन सुनिश्चित करने वालों को दोबारा सोचना चाहिए। यदि कानून का ऐसा ही अर्थ निकलता रहा तो लोगों से उसपर भरोसा करने के लिए कहना भी मुश्किल हो जाएगा। ऐसी अराजक स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ राजनेता ही दोषी होंगे। बाल अधिकार, पशु अधिकार और मानवाधिकार की बातें एक सीमा तक ही ठीक लगती हैं। संविधान किसी को इस बात की इजाजत नहीं देता कि वह दूसरों की खुशियों और इच्छाओं का गला घोंटकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करे फिर चाहे पीड़ित लड़का हो या लड़की। पागल हो जाए तो जानवर को भी गोली मार दी जाती है। ऐसा करने से पहले उसकी उम्र नहीं पूछी जाती।
इस वाकये का एक पहलू यह भी है कि यदि किसी को 18 साल का होने से पहले तक कुछ भी करने की छूट दी जाती रही तो उससे 18 साल का होने के बाद एकाएक शरीफ नागरिक बन जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

चुनाव क्यों नहीं लड़ लेते आसाराम

आसाराम पर लगे यौनाचार के आरोप के बाद एक बात तो साफ हो गया है कि आसाराम के प्रति उनके समर्थकों और अनुयायियों की आस्था सौ टका टंच है। वे उनके खिलाफ कुछ भी नहीं सुन सकते। वे उनके लिए जान देने को भी तैयार हैं। यह सिर्फ समर्थन नहीं बल्कि आस्था का मामला है। आस्थावान तो पत्थरों और झंडों की हिफाजत के लिए जान की बाजी लगा देते हैं और फिर यहां तो सवाल जीते जागते इंसान का है। सफेद दाढ़ी और सफेद चोगे का है। बहरहाल हम यहां इस बहस में नहीं उलझना चाहते कि आसाराम दोषी हैं या नहीं। हम घटना से प्रत्यक्ष जुड़े हुए नहीं हैं। हम जांच एजेंसी भी नहीं हैं। जितना जानते हैं वह पढ़ा-सुना है। हम तो सिर्फ इतना जानते हैं कि दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक व्यक्ति बेगुनाह है। आसाराम भी। हां! यहां यह टिप्पणी जरूर करना चाहेंगे कि आसाराम जैसे स्थापित लोगों को अपनी दिनचर्या में कुछ और सावधानियां बरतनी चाहिए।
यह बहस एक तरफ, इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह है कि आसाराम के चाहने वालों ने पूरे देश भर में रैलियां निकलीं। गली-गली में बहस हो रही है और बापू से जुड़े लोग आरोपों का प्रबल विरोध कर रहे हैं। जब पुलिस आश्रम पहुंची तो आसाराम को बचाने के लिए ये पुलिस की राह में ही लेट गए। आसाराम का भी पुतला जला-ठीक वैसे ही जैसे दूसरे नेताओं का जलता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा खानदानी कांग्रेसी कांग्रेस की आलोचना नहीं सहता, भाजपाई और संघी भाजपा की बुराई नहीं सुनते।
इससे यह सवाल उभरता है कि क्या आसाराम में नेतागिरी का पोटेंशल है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। यदि आसाराम नेता बन जाते हैं तो वे विधानसभा और लोकसभा तक पहुंच सकते हैं। वहां ऐसे कानून बना सकते हैं जिससे बुजुर्गों को भी नाबालिगों जैसा दूधभात मिले। उम्मीद है कि इसमें सभी दल साथ देंगे। ऐसा कानून बन गया तो एनडी, राघव जैसे लोग भी फजीहत से बच जाएंगे।

Tuesday, 16 July 2013

शहंशाह अमेरिका को मजा नहीं आया

भले ही देश के भीतर की छोटी-छोटी जागीरें समाप्त कर दी गई हों किन्तु ग्लोबल प्लैटफार्म पर भारत की हैसियत एक जागीर जैसी ही है। हो सकता है इस जागीर की रेटिंग अच्छी हो। यहां पहाड़ और वादियां हों, धन धान्य से परिपूर्ण मैदानी इलाके हों, सस्ता ह्यूमन रिसोर्स, रंगबिरंगी लोकसंस्कृति हो किन्तु इस सबके बावजूद इसकी हैसियत जागीर की ही है। शहंशाह तो अमेरिका है। सबकुछ उसके खुश रहने पर निर्भर करता है। इसलिए अपनी जागीर में कुछ सुधार करने के बाद जब भारत का जागीरदार अमेरिका पहुंचकर उसकी राजी-खुशी पूछता है तो वह एक बार उसके पुट्ठे सेंक कर वापस भेज देता है कि जाओ और ‘यह’ करके आओ। तुमने जो कुछ किया वह ठीक है, पर यही सबकुछ नहीं है। हम खुश नहीं हैं। मजा नहीं आया।
यह एक विडम्बना ही है कि भले ही सैनिकों की शहादतों पर हमारी पलकें आज भी नम होती हों, क्रिकेट में जीत की हमें खुशी होती हो किन्तु हकीकत में हमारे मन में देश का कंसेप्ट ही क्लीयर नहीं है। देश की आधी से ज्यादा आबादी युवाओं की है। स्मार्ट फोन, स्मार्ट ड्रेस, स्मार्ट फूड और स्मार्ट लाइफस्टाइल के शौकीन ये युवा सबसे आगे रहना चाहते हैं। इन्हें नई तकनीक भाती है। ये बेहतर लाइफ स्टाइल चाहते हैं। मौका मिले तो इनमें से अधिकांश अमेरिका, यूरोप या आस्ट्रेलिया में नौकरी करना चाहते हैं। देश की बुरी हालत को लेकर इनमें आक्रोश है। वे कहते हैं, यहां कुछ भी ठीक नहीं है। सड़कों पर गड्ढे और स्पीडब्रेकर हैं। ट्रैफिक का माईबाप नहीं है। नौकरी में अच्छा वेतन नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। वे चाहते हैं कि व्यवस्था बदले। परिवर्तन की इसी आस में वे कभी अन्ना हजारे, कभी केजरीवाल तो कभी मोदी के पीछे भागते हैं।
और सिर्फ युवा ही क्यों, न्यूनतम पर जीवन जीने का प्रवचन सुनने वाले प्रौढ़ भी इस दौड़ में शामिल हैं। जरा उनके महल देखिए, उनकी गाड़ियां देखिए, उनके दफ्तर देखिए। पैसों की उनकी भूख देखिए। वे एक साथ कई पीढ़ियों के लिए कमा लेना चाहते हैं। अदृश्य कीड़े-मकोड़ों तक की चिंता करने वाले लोग इंसानों की लाशों पर चलना चाहते हैं। परोपकार के लिए दानपेटियां हैं ना। टैक्स रिबेट भी मिलता है। कुछ साधु संतों महात्माओं की सेवा कर लो, साल में दो चार प्रवचनों को स्पांसर कर दो। इतना काफी है।
ऐसे विचित्र देश में जब केएफसी, अंकल चिप्स का मुकाबला बाबा रामदेव काढ़ा और कुल्थी से करना चाहते हैं, और वे लोकप्रिय भी होते हैं तो मामला दिलचस्प हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हिन्दी की दुहाई देने वालों के बच्चे विदेश जाकर अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन सीखते हैं। पब में दारू पीते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हैं। देश में बेकार की बहस होती रहती है और वे उसे भी स्पांसर करते रहते हैं।

Monday, 15 July 2013

कुत्ते का पिल्ला, सेक्यूलरिज्म का बुर्का

मोदी के मुंह से यह क्या निकल रहा है? एक के बाद एक वे ऐसे शिगूफे छोड़ रहे हैं जिसके लिए उन्हें दोषी तो नहीं ठहराया जा सकता अलबत्ता उसका मतलब निकालकर लोग बहस खूब कर सकते हैं। इस उद्देश्य में वे सफल भी रहे हैं। कांग्रेस, सपा, बसपा ने मोदी का फेंका चारा निगल लिया है और बस अब कांटे का उनके गले में उतरना बाकी रह गया है। दरअसल इस खेल की शुरुआत खुद कांग्रेस ने की है किन्तु अब इसमें मास्टरी मोदी को हो गई है। कांग्रेस ने अंग्रेजों की सोहबत में राजनीति सीखी थी। उनका तरीका था किसी देश को छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ दो और फिर उनकी साहूकारी करो। कांग्रेस ने इसी ढर्रे को अपनाया। अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, आदिवासी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति.. न जाने कितनी तरह के वर्ग पैदा कर लिए। इस लिफाफेबाजी में एक बहुत बड़ा वर्ग, सवर्णों का छूट गया। आरएसएस की इस सवर्ण वर्ग पर लंबे समय से नजर थी। बस उन्हें कोई ऐसा नेता नहीं मिल रहा था जो उनके सिखाए को तोते की तरह दोहरा सके। वाजपेई खुद एक बुद्धिमान व्यक्ति थे, आडवाणी भी अपने स्टेटस की चिंता करने लगे थे। इसलिए जो वाजपेई या आडवाणी के रहते संभव नहीं था, उसे मोदी संभव बना रहे हैं। इसलिए मोदी जब दंगों में मारे गए लोगों के बारे में कहते हुए दंगों में मारे गए लोगों की तुलना सड़क पर गाड़ी के नीचे आने वाले पिल्ले से करते हैं तो उसपर हायतौबा मचती ही है। मोदी या मोदी का भाषण बुनने वालों को भली भांति पता है कि इसका कौन क्या मतलब निकालेगा और कौन क्या कहेगा। अभी इसकी आंच कम भी नहीं हुई थी कि धर्मनिरपेक्षता के बुर्के के रूप में उन्होंने दूसरा फिकरा उछाला। एक बार फिर सेकुलर लोगों ने चारा लपक लिया। हिंदी के शोहदे आम तौर पर चीजों पर खाक डाला करते हैं, कंबल ओढ़ाया करते हैं। पर मोदी के भाषण में इन साधारण शब्दों या उपमाओं का क्या काम? वे तो जानबूझकर ठहरे हुए पानी में कंकड़ मार रहे हैं। बर्र के छत्ते में हाथ दे रहे हैं। मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ रहे हैं। उन्हें पता है कि इसपर जब बहस खुलेगी तो कौन क्या कहेगा। हिन्दुओं को इसमें बुरा कुछ भी नहीं दिखेगा। ठीक ही तो है, गाड़ी के नीचे आकर पिल्ला कुचल जाता है तो कमर्शल ड्रायवर को भी दुख होता है। इसलिए दंगों का मोदी को भी दुख हुआ ही होगा। इसी तरह कांग्रेस के बुर्का ओढ़ने की बात भी हिन्दुओं को गुदगुदा जाएगा। लोग इसे मोदी की दीदादिलेरी ही समझेंगे। वे मोदी के फैन तो हैं ही, उनके मुरीद हो जाएंगे। मोदी सोची समझी योजना के तहत ये भाषण दे रहे हैं। उन्हें पता है कि कांग्रेस के अधिकांश नेताओं के बाल धूप में सफेद हुए हैं। वे बैठे बैठे वरिष्ठ हो गए हैं। अक्ल उनमें धेले की नहीं है। वरना जिन टिप्पणियों पर उसे खामोशी की चादर ओढ़ लेनी चाहिए उसपर वे गलाबाजी कर रहे हैं। मोदी बाउंसर पर बाउंसर दे रहे हैं और कांग्रेसी, बसपाई, सपाई, आदि बल्लेबाजी करने की कोशिश कर रहे हैं। कब मुंह नाक फूट जाए पता नहीं....

Thursday, 11 July 2013

कांग्रेस के पाजामे का नाड़ा गायब

कहते हैं बन्दर कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाए गुलाटी मारना नहीं छोड़ता। कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही है। यह बूढ़ी शतायु पार्टी अपनी पारी खेल चुकी है। उम्र के लिहाज से पार्टी को बेहद जिम्मेदार और वजनदार माना जाना चाहिए। पर हाल के वर्षों में उसका दीवालियापन दिखाई देने लगा है। कोई काम धंधा है नहीं। राजनीति में जमूरों की जरूरत प्रत्येक पार्टी को होती है। पर यहां तो जमूरे ही जमूरे हैं। दो दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह से लेकर केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा तक जहां जाते हैं अल्लम-गल्लम बोलकर खुद अपने लिए और पार्टी के लिए मुसीबत बुला लेते हैं। राजनीति में भी पार्टी हर बार गच्चा खा जाती है। इस बार मामला मध्यप्रदेश का है। बड़ी मुश्किल से मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का माहौल बना था। कांग्रेस ताल ठोंककर मैदान में उतरी भी... पर यह क्या... जांघ पर एक हाथ मारा और पाजामा खुल कर नीचे जा गिरा। किसी ने नाड़ा ही खींच लिया था। सरे बाजार बेआबरू होने के बाद अब कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचने में लगी है। प्रदेश कांग्रेस धोखा देने वाले उपनेता प्रतिपक्ष राकेश सिंह चतुर्वेदी को गद्दार कहकर भड़ास निकाली और माँ-माँ चिल्लाते दिल्ली भाग गई। इधर कथित गद्दार मुख्यमंत्री की गोद में बैठकर अपना स्वागत सत्कार करा रहे हैं। पुष्पहार पहन चुके हैं, वृहन्नला नृत्य बाकी है। दरअसल कांग्रेस बदलते माहौल को भांप ही नहीं पा रही है। दो-दो दशक पार्टी की सेवा में लगा देने वाले अब मौका चाहते हैं। जो लोग नेतागिरी के साथ उद्योग धंधा भी चलाते हैं, अब खुद को समेट कर काम-धंधे से लग गए हैं। जिनके हाथ खाली हैं वे एक मौके के लिए किसी भी हद से गुजर जाने को तैयार हैं। रामदेव-हजारे-केजरी-मोदी के प्रेशर में बैठी कांग्रेस की हालत प्रेशर बम जैसी हो रही है। पार्टी को समझना होगा कि अब जिनसे पाला पड़ा है, वे देश विदेश की राजनीति-कूटनीति के विशेषज्ञ हैं। केजीबी, माफिया, सीआईए, आईएसआई में उनका अध्ययन गहरा है। वे जानते हैं कि युद्ध और राजनीति में सबकुछ जायज है। कांग्रेस के पास जमूरे हैं तो उनके पास बहुरूपियों की फौज है। वक्त सावधान हो जाने का है वरना अभी तो सरेआम पाजामा सरका है, कब कच्छा निकल जाए कहा नहीं जा सकता।

मेट्रो एमएमएस, झख मारेगी पुलिस

देश में कानून व्यवस्था का हाल देखो तो पुलिस पर दया आती है कि बेचारे इतने कम आदमी और संसाधन के साथ कैसे काम करते होंगे। इसलिए जब सड़कों पर, बसों में, झुरमुट में बलात्कार होते हैं तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होती है कि पुलिस हर जगह तो नहीं हो सकती। चोरी चकारी की घटनाओं के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि जब लोगों से अपना घर नहीं संभल रहा तो दो-चार सैकड़ा पुलिस वालों से हजारों मकानों की सुरक्षा की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। ऐसा नहीं है कि इन हालातों की जानकारी सरकार को नहीं है किन्तु वह बेतुके फूं-फां के चलते तमाम किस्म की सिरदर्दी मोल लेती है जिसका जमा-खर्च कुछ नहीं है। अब मेट्रो रेल में युवा कपल्स की हरकतों के मामले को ही लें। मेट्रो में सुरक्षा के लिए लगे कैमरों ने इनकी अश्लील हरकतों को रिकार्ड कर लिया। मेट्रो या सीआईएसएफ के किसी कर्मचारी या कर्मचारियों ने उसे विदेशी पोर्न साइट्स को बेच भी दिया। इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला कायम किया है। अब दूसरा काम जो उसने अपने हाथ में लिया है वह न केवल बेतुका बल्कि गैरजरूरी भी है। वह वीडियो फुटेज में बेजा हरकत कर रहे कपल्स को दिल्ली की डेढ़ करोड़ की आबादी में तलाशेगी। इसके लिए उसे समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की खाक छाननी होगी। इसके बाद भी हासिल आएगा क्या? ज्यादा से ज्यादा आईपीसी की धारा 294 के तहत कार्रवाई की जा सकेगी। यदि जुर्म साबित हुआ तो अधिक से अधिक तीन माह की सजा और जुर्माना हो सकता है। जेलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। और यह कोई जेल जाने लायक हरकत भी नहीं है। मौजूदा हालातों में जितनी बेजा यह हरकत है, उनकी गिरफ्तारी उससे कहीं ज्यादा बेजा हरकत होगी। वैसे भी तय है कि हरकतें एकांत के पलों में हुई होंगी। जब किसी ने देखा ही नहीं होगा तो किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है? इसलिए धारा 294 इस मामले में लागू होगी, इसपर भी पर्याप्त शंका है। अगर पुलिस यह काम नहीं भी करेगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बेहतर है पुलिस के उपलब्ध बल को किसी फलदायक कार्य में झोंका जाए ताकि सुरक्षा का माहौल बना रहे। 

Sunday, 7 July 2013

Sex, Politics and News

This week came up with bizarre sex scandals. While two were from the political shed a stray one had something to do with ex-Miss Universe Yukta Mookhey. A Minister in MP lost his job. Veteran leaders of UP have become red in the face. More eyes are staring at Yukta Mookhey on the web than ever before. What's so hot about it. These filthy stray incidents overshadowed news of 'Choice of language at the primary level, doling out gift hampers to gain political mileage before elections and many others.
Sex has been the subject of greatest interest since man loved to think. This was reflected in his drawings, paintings, sculptures. Ancient temples bear figurines with exagerated organs. From Konark to Bhoramdeo, Ajanta caves to Khajuraho voyeurism and fetish can be found everywhere. This has got nothing to do with the West. As other things we may well, boast that the West learnt the art of Sex from India.
The first bouncer was delivered by Madhu Pandey a known politician in Uttar Pradesh. She sent people rocking by stating that even the Octogerians in politics demand for young new girls, every now and then. The language they use for such girls is interistingly 'Chooja' (chicken). They ask aspiring new comers to bring some 'Choojas' with them. This is what has been happening in the country's politics since independence. Powerfull and influential people ask for sexual favours from new comers. This is what they crave for after power and money. 
The next was a bit more private. BJP leader and Minister Raghavji has been an influential politician for decades. Suddenly his own party member and onetime friend Shiv Shankar Pateria came up with the news that he had made 22 video recordings of the stalwart which showcased his carnal desires. The video footage are said to be about gay escapades of Raghavji with his servant. Pateria categorically states that the recordings were made in AC coupe of running trains. Raghav may be gay but Pateria is a pervert. Raghav let go off his ministry while Pateria was suspended from the party.
The third one is a bit more disturbing. Former Miss universe Yukta Mookhey had problems with sexual orientations of her husband. She seeked legal recourse, rightfully. The media should have spared her privacy. Fuelled by the neo sense of news writing the story was spiced up with sections of the IPC which reads out loud in itself. More than 3 million searches were made for her hot pics and videos. Who knows, the celebrity too was happy for the attention she received. After Sunny Leonne became a celebrity in India, these may be called only trifles.
Last but not the least, SP of Jaipur, Rajasthan has received a complaint from a lady who claims that the SDM asked her for sexuals favours when she approached him to sort out some problems.
Are we really sex starved? Send in your comments to sundaycampus@gmail.com
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