कहते हैं बन्दर कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाए गुलाटी मारना नहीं छोड़ता। कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही है। यह बूढ़ी शतायु पार्टी अपनी पारी खेल चुकी है। उम्र के लिहाज से पार्टी को बेहद जिम्मेदार और वजनदार माना जाना चाहिए। पर हाल के वर्षों में उसका दीवालियापन दिखाई देने लगा है। कोई काम धंधा है नहीं। राजनीति में जमूरों की जरूरत प्रत्येक पार्टी को होती है। पर यहां तो जमूरे ही जमूरे हैं। दो दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह से लेकर केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा तक जहां जाते हैं अल्लम-गल्लम बोलकर खुद अपने लिए और पार्टी के लिए मुसीबत बुला लेते हैं। राजनीति में भी पार्टी हर बार गच्चा खा जाती है। इस बार मामला मध्यप्रदेश का है। बड़ी मुश्किल से मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का माहौल बना था। कांग्रेस ताल ठोंककर मैदान में उतरी भी... पर यह क्या... जांघ पर एक हाथ मारा और पाजामा खुल कर नीचे जा गिरा। किसी ने नाड़ा ही खींच लिया था। सरे बाजार बेआबरू होने के बाद अब कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचने में लगी है। प्रदेश कांग्रेस धोखा देने वाले उपनेता प्रतिपक्ष राकेश सिंह चतुर्वेदी को गद्दार कहकर भड़ास निकाली और माँ-माँ चिल्लाते दिल्ली भाग गई। इधर कथित गद्दार मुख्यमंत्री की गोद में बैठकर अपना स्वागत सत्कार करा रहे हैं। पुष्पहार पहन चुके हैं, वृहन्नला नृत्य बाकी है। दरअसल कांग्रेस बदलते माहौल को भांप ही नहीं पा रही है। दो-दो दशक पार्टी की सेवा में लगा देने वाले अब मौका चाहते हैं। जो लोग नेतागिरी के साथ उद्योग धंधा भी चलाते हैं, अब खुद को समेट कर काम-धंधे से लग गए हैं। जिनके हाथ खाली हैं वे एक मौके के लिए किसी भी हद से गुजर जाने को तैयार हैं। रामदेव-हजारे-केजरी-मोदी के प्रेशर में बैठी कांग्रेस की हालत प्रेशर बम जैसी हो रही है। पार्टी को समझना होगा कि अब जिनसे पाला पड़ा है, वे देश विदेश की राजनीति-कूटनीति के विशेषज्ञ हैं। केजीबी, माफिया, सीआईए, आईएसआई में उनका अध्ययन गहरा है। वे जानते हैं कि युद्ध और राजनीति में सबकुछ जायज है। कांग्रेस के पास जमूरे हैं तो उनके पास बहुरूपियों की फौज है। वक्त सावधान हो जाने का है वरना अभी तो सरेआम पाजामा सरका है, कब कच्छा निकल जाए कहा नहीं जा सकता।

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