Saturday, 6 July 2013

जिंदल ने ठीक किया

सरकारी दबाव और मुफ्त की नेतागिरी से झुंझला कर जिंदल ग्रुप ने रायगढ़ में संचालित अपना इंजीनियरिंग कालेज बंद कर दिया। ले अब उखाड़ ले। एक ढंग का कालेज खुद तो खोल सकते नहीं। कालेज ही क्यों आज तक एक ढंग का स्कूल या अस्पताल तक नहीं खोल पाई है सरकार। राईस मिलर और जमीन दलाल कालेज खोले पड़े हैं। इस भीड़ में कुछ लोग ईमानदारी से मानव संसाधन का विकास करने में लगे थे। इन लोगों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि इसका एंड प्राडक्ट उनके ही काम आना था। पर सरकार और मीडिया दोनों का एक ही हाल है। सत्ता हाथ में आते ही टटपुंजिया हाकिम बन जाता है। मीडिया का लेबल लगते ही थर्ड डिवीजन ग्रेजुएट आईएएस-आईपीएस को चमकाने लगता है। डाक्टर को इलाज करना सिखाता है और इंजीनियर को रोड बनाना। हादसे बाद में होते हैं, इनकी एक्सपर्ट ओपीनियन पहले आ जाती है। इस भीड़ में अपनी जगह खुद बनाने की इच्छा रखने वाले लोगों की राह में रोड़े ही रोड़े हैं। प्रत्येक उद्यमी को ये दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। इसके लिए वह मानसिक तौर पर तैयार भी रहता है पर हर बात की हद होती है... दादागिरी और नेतागिरी की भी। छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ तकनीकी शिक्षा निदेशालय (डीटीई) और फीस निर्धारण समिति ने मिलकर कुछ ऐसा माहौल तैयार किया कि पूरी व्यवस्था चारों खाने चित हो गई। कुलपति से लेकर राष्ट्रपति तक कालेजों और विश्वविद्यालयों की साख का रोना रोते रहे और डीटीई तरक्की की राह में रोड़े अटकाता रहा। फीस समिति ने अंधेर नगरी चौपट राजा की कहावत चरितार्थ कर डाली। इस सबसे बचने के लिए कुछ चोटी के तकनीकी महाविद्यालय अब खुद को विश्वविद्यालय घोषित करने की तैयारी कर रहे हैं। वे सफलता के बहुत करीब जा चुके हैं। ओपी जिंदल ग्रुप भी ऐसे ही उद्यमियों में से एक हैं। उनकी यूनिवर्सिटी जल्द ही आने वाली है। इसलिए उन्होंने इस प्रवेश सत्र को जीरो ईयर घोषित कर दिया था। पर विश्वविद्यालय ने अपनी मनमानी जारी रखते हुए कालेज को काउंसलिंग में शामिल कर लिया। जबरदस्ती बच्चे दे दिए। अधिकांश बच्चे स्तरहीन थे। अंतत: ग्रुप को कड़ा फैसला करना पड़ा। उसने कालेज ही बंद कर देने की घोषणा कर दी। यह बेहद जरूरी था। नौकरशाहों के आगे घुटने टेकते-टेकते देश की आत्मा मर चुकी है। ऐसे में जिंदल द्वारा उठाया गया कदम कुछ और लोगों को हिम्मत दे सकता है। चार लोगों ने भी ऐसा किया तो मीडिया-अफसरशाही-नेता का माफिया गठजोड़ टूट सकता है। जिस युवा को फांसने के लिए मुफ्त लैपटाप और टैब बांटा जा रहा है खुद वही बगावत पर उतर सकता है। बहरहाल इस पूरे एपिसोड से मुझे एक वाकया याद आ रहा है। एक बार एक निजी अभियांत्रिकी कालेज के निदेशक के सामने मैं बैठा ही था कि सीएसवीटीयू का एक आदमी वहां पहुंचा। उसने तमाम नई शर्तों की जानकारी दी। निदेशक महोदय ध्यान पूर्वक सुनते रहे। जब रिकार्ड बजना बंद हुआ तो उन्होंने केवल इतना कहा, ‘जो सूचनाएं आप दे रहे हैं, उनका हमें बनने के पहले से पता है। आप लोग नौकरी करने आए हो। नौकरी ही करोगे। इसके आलावा आपका कोई कमिटमेंट होना भी नहीं चाहिए। आप उस कौम से हो जो नौकरी से रिटायर हो जाने के बाद भी पार्टटाइम नौकरी तलाशोगे। वहां बैठकर अपनी पुरानी तैनाती की किस्सागोई करोगे। आप लोगों से हमें कोई उम्मीद भी नहीं। जब सरकार के पास ही कोई विजन नहीं तो आपके पास क्यों हो?’
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