Tuesday, 9 April 2013

सुब्बाराव आंखें खोलो


वाह! क्या पता लगाया है। गरीब खा-खाकर देश में महंगाई बढ़ा रहे हैं। गरीब का पेट बड़ा होता है, यह तो सुना था किन्तु वह पेट कितना बड़ा होता है इसका अंदाजा नहीं था। इस बात का तो अंदाजा ही नहीं था कि गरीब का पेट देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर सकता है, मुद्रास्फीति ला सकता है या महंगाई के ग्राफ को पतंग बनाकर उड़ा सकता है। यह बात किसी मामूली आदमी ने नहीं बल्कि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कही है। गवर्नर साहब फरमाते हैं कि गरीब की आमदनी बढ़ी है जो एक अच्छा संकेत है। आमदनी बढ़ने
के कारण वह मोटे अनाज के बजाय प्रोटीन युक्त दालें, अंडा, मांस, दूध, फल और सब्जियों का उपयोग कर रहा है। इससे इन चीजों की मांग बढ़ी है और महंगाई में इजाफा हुआ है। गुस्सा इस बात का नहीं कि सुब्बाराव ने गरीब की थाली पर नजर मैली की है बल्कि इस बात का है कि वे रिजर्व बैंक के गवर्नर क्यों और कैसे हैं। वे कह रहे हैं कि उनके पास इस बात के सबूत भी हैं कि ग्रामीणों की आय में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। उनको बताए जाने की जरूरत है कि प्रतिदिन सौ रुपए या उससे भी कम कमाने वाले की कमाई में यदि सौ फीसदी की भी वृद्धि होती है तो भी उसकी औकात दूध, अंडा या मांस खाने की नहीं बनती। वह तब भी बाजार में केवल आम का रेट पूछता है और उसकी कीमतें गिरने का इंतजार करता है। झुग्गी में रहने वाली माँ तब भी अपने बच्चे को दूध के बजाय धोवन-पसावन ही पिलाती है। सुब्बाराव को वह तबका शायद दिखा ही नहीं जिसे हम नौकरीपेशा मिडिल क्लास कहते हैं। उसकी औकात बढ़ती है या बढ़ाई जाती है तो वह फिजूलखर्च हो जाता है। ब्रांडेड पहनने ओढ़ने लगता है, पिज्जा की दुकानों पर लाइन लगाता है। मॉल का दीवाना होता है। मतलब जानने के बाद भी हर चीज एमआरपी पर खरीदता है। पांच रुपए की कट चाय कॉफी हाउस में बैठकर 15 रुपए में पीता है। उसके मन में गहरे पैठ चुकी हीन ग्रंथि उसे यह सब करने के लिए उकसाती है। इन्हें छेड़ने का साहस सुब्बाराव जैसे लोग कभी नहीं कर पाते। पर महंगाई इनकी वजह से भी नहीं बढ़ती। महंगाई बढ़ती है सरकार की गलत नीतियों से। सरकार फेयर कांपीटिशन के रास्ते बंद कर देती है और लोगों को कमाने का मौका देती है ताकि उनसे मोटा चंदा वसूला जा सके। दुकान, फैक्ट्री, स्कूल, कालेज आप कोई भी उद्यम करने जाएं तो इसका पता चल जाएगा। मुट्ठियां गर्म करते-करते आपकी पूंजी चुक जाएगी। शर्तें पूरी करते आपकी उम्र बीत जाएगी। इसलिए नए उपक्रम नहीं खुलते और पुराने एकाधिकार जैसी स्थितियों का लाभ उठाते हैं। महंगाई के और भी कारण हैं। ट्रक खरीदने और डीजल भराने के बाद ट्रांसपोर्टर सड़क पर चलने के लिए टोल टैक्स भरता है और सरकार को रोडटैक्स भी अदा करता है। खर्च डबल तो ढुलाई भी डबल। इसका भार ढोए गए सामान की कीमत पर ही पड़ता है। सुब्बाराव को नहीं पता तो वे स्कूल-कालेज की पढ़ाई एक बार फिर कर लें। वैसे दोष सुब्बाराव को भी क्या दें। इससे पहले प्रधानमंत्री भी लगभग ऐसा ही कुछ कह चुके हैं।

मोदी की आक्रामकता


 
भारतीय जनता पार्टी की बागडोर राजनाथ सिंह के हाथ आने के बाद हुई पहली बैठक में भी वही हुआ जो इससे पहले के भाजपाई जमावड़ों में होता रहा था। नरेन्द्र मोदी ‘नमो’ बैठक पर छा गए। उन्होंने न केवल टीम भाजपा को जीत का मंत्र दिया बल्कि उन्हें यह सीख भी दी कि उन्हें अब आक्रामक हो जाना चाहिए। उनकी इस सीख का भाजपा पर क्या असर हुआ यह तो नहीं पता अलबत्ता कांग्रेस ने यह आइडिया लपक लिया। सपा सुप्रीमो मुलायम के मोदी-राग से पहले ही हलाकान कांग्रेस ने तगड़ा पलटवार किया। कांग्रेस के कपिल सिब्बल ने सपा से कहा कि यदि उसमें हिम्मत है तो वह यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर बताए। इससे पहले मुलायम कांग्रेस पर यह आरोप लगा चुके हैं कि वह अपने विरोधियों को ठीक करने के लिए सीबीआई का उपयोग-दुरुपयोग करती है। सपा पहले भी कई बार इशारा कर चुकी है कि उसमें और भाजपा में कई समानताएं हैं। और फिलहाल उनका दामन साफ नहीं है। वो तो द्रमुक ने समर्थन वापस ले लिया तो उन्हें मौका मिल गया वरना उनकी कोई पूछपरख तक नहीं थी। समर्थन वापस लेने के बाद द्रमुक वैसे ही नर्म पड़ गया है। वैसे यहां बात नुस्खों की हो रही थी। ऐसा नहीं है कि अकेले कांग्रेस ने मोदी का नुस्खा चुराया। खुद मोदी ने उस राहुल का नुस्खा चुरा लिया जिसे वे राजनीति के मैदान में बच्चा समझते हैं। मोदी ने खुद आक्रामकता छोड़ दी और फिक्की के समारोह में राहुल की लाइन पकड़ ली। उन्होंने देश में सुशासन लाने के लिये सबके सहयोग को अपरिहार्य बताया। भाषा अलग थी पर मतलब साफ था कि वे राहुल की सोच से अलग नहीं है। नमो को नमो-नमो।

Sunday, 7 April 2013

आईआईएम डिग्री देने की तैयारी में



वैश्विक इकाइयों से मान्यता का प्रयास
स्वतंत्र डिग्री देने की क्षमता होगा लक्ष्य
कोलकाता। विदेशी छात्रों को अपने पाठ्यक्रमों की ओर लुभाने के लिए भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अब दो वैश्विक इकाइयों से मान्यता तथा व्यवसाय प्रबंधन में डिप्लोमा की बजाय डिग्री प्रदान करने की शक्ति हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
आईआईएम कोलकाता के निवर्तमान निदेशक शेखर चौधरी ने कहा, भारतीय प्रबंधन संस्थानों को डिप्लोमा की बजाय डिग्री प्रदान करने में सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हालांकि, प्रबंधन में आईआईएम के स्नातकोत्तर डिप्लोमा की उद्योग जगत में काफी धाक है, लेकिन डिग्री भारतीय प्रबंधन संस्थानों की प्रतिष्ठा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने में मदद करेगी।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय पहले से ही एक संसद अधिनियम के जरिए भारतीय प्रबंधन संस्थानों को डिग्री प्रदान करने की शक्ति देने पर विचार कर रहा है।
उन्होंने कहा कि डिग्रियां आईआईएम को विभिन्न तरह के पाठ्यक्रम विकसित करने में व्यापक शैक्षिक लचीलापन उपलब्ध कराएंगी जो आज संभव नहीं है। आईआईएम अब तक प्रबंधन में दो वर्षीय स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्रदान करते रहे हैं जो एमबीए के बराबर है।
बिजनेस स्कूलों की विशिष्ट श्रृंखला पिछले चार-पांच साल से एसोसिएशन आॅफ कॉलेजिएट स्कूल्स आॅफ बिजनेस (एएसीएसबी) की मान्यता हासिल करने की कोशिश कर रही है।

www.sundaycampus.com



एसडीएम और जांच अधिकारी पर मुकदमा चलाने की मांग


नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2013
पत्नी को जलाकर मारने के आरोप से करीब 20 साल बाद बरी हुए व्यक्ति ने एसडीएम और जांच अधिकारी पर मुकदमा चलाने के लिये अदालत में मामला दायर किया है। उसका आरोप है कि इन दोनों अधिकारियों ने मृतका का फर्जी मृत्युपूर्व दस्तावेज अदालत में पेश कर उसे फंसाया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राकेश कुमार ने सुभाष की शिकायत रिकार्ड पर लेते हुये 16 अप्रैल को इस पर सुनवाई करने का निश्चय किया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 अगस्त, 2011 को सुभाष को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
निचली अदालत ने सुभाष को अपनी पत्नी रीता को मई 1991 में कथित रूप से जलाकर मार डालने के जुर्म में सितंबर, 1997 में उम्र कैद की सजा सुनायी थी। सुभाष और रीता का विवाह करीब साढ़े सात साल पहले हुआ था और उनके छह साल का एक बच्चा था।
सुभाष ने आरोप लगाया है कि एसडीएम ने अदालत में कहा था कि 19 मई, 1991 को जांच अधिकारी प्रताप सिंह ने अस्पताल में रीता का बयान दर्ज करने के लिये संपर्क किया था जहां वह दोपहर में पहुंचे थे।
जांच अधिकारी प्रताप सिंह ने हालांकि अदालत में कहा कि उन्हें एसडीएम द्वारा रीता का बयान दर्ज करने के बारे में 19 मई, 1991 की शाम को मृतक के पिता का फोन आया था और इसके बाद उसने एसडीएम से रात में ही संपर्क किया। बाद में दोनों बयान दर्ज करने के लिये अस्पताल गये।
पुलिस के अनुसार स्कूल शिक्षिका रीता ने मृत्यु पूर्व दिए अपने बयान में आरोप लगाया था कि उसके पति ने कहासुनी के बाद उस पर मिट्टी का तेल छिड़कर आग लगा दी। इस हादसे में बुरी तरह झुलसी रीता की बाद में अस्पताल में मृत्यु हो गयी थी।
सुभाष का कहना है कि इन अधिकारियों के बयानों में ‘महत्वपूर्ण विरोधाभास’ है जो झूठी गवाही देने सहित विभिन्न अपराधों के लिये उन पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है। उसकी पत्नी का मृत्यु से पूर्व कथित बयान ‘फर्जी दस्तावेज’ है और इसे एसडीएम तथा जांच अधिकारी ने अस्पताल गए बगैर ही तैयार कर लिया था।

आरोप तय होने से पहले मिले आरोपी को मौका : अदालत


 मुंबई। बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी भी आरोपी को आरोप तय होने से पहले मामले से मुक्त होने की मांग करने का मौका मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने कहा, मेरा मानना है कि निचली अदालत को याचिकाकर्ता को आरोप पत्र पर सोच-विचार करने और आरोप मुक्त होने के लिए आवेदन करने की इजाजत देनी चाहिए थी। सीधे उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की जरूरत नहीं थी।
अदालत ने रिश्वतखोरी के मामले में वकील मंदर गोस्वामी के खिलाफ तय आरोप को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। गोस्वामी को पिछले साल मार्च में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इसी के साथ पूर्व विधान परिषद सदस्य कन्हैया गिडवानी और उनके बेटे कैलाश, तथा कर सलाहकार जेके जगियासी को भी गिरफ्तार किया गया था।
इन लोगों को आदर्श सोसायटी घोटाले के मामले में गिडवानी परिवार के खिलाफ लगे आरोपों को कमजोर करने के लिए कथित तौर पर घूस लेने के मामले में गिरफ्तार किया गया था।
गोस्वामी के अनुसार बीते साल 25 अक्तूबर को विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश ने उन्हें सम्मन किया और फिर सूचित किया गया कि उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हो चुका है।
याचिकाकर्ता की दलील को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने तय आरोप को खारिज कर दिया और कहा, मेरा विचार है कि निचली अदालत को इन तथ्यों और परिस्थितियों में फौरन कार्यवाही नहीं करनी चाहिए थी। उच्च न्यायालय ने वकील को आदेश दिया कि वह 10 दिनों के भीतर निचली अदालत के समक्ष आरोपमुक्त होने के लिए आवेदन करें।

मुंह को लगाम नहीं



बहुत पहले एक फिल्म आई थी। नाम तो याद नहीं पर उसमें एक नेता की टिप्पणी याद रह गई। नेता ने कहा था कि यदि नदी के पानी से बिजली निकाल ली गई तो फिर खेतों का क्या होगा? लोगों को लगा था कि फिल्मी लोगों ने नेताओं को नीचा दिखाने के लिए अतिश्योक्ति का उपयोग किया था। पर वास्तव में हकीकत से यह काफी कम था। नेता किस हद तक जा सकते हैं, क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी बानगी देखेंगे तो अकेले में भी शर्मा जाएंगे। प्रभाकर देशमुख नाम का एक शख्स अपने खेतों के लिए पानी की मांग को लेकर पिछले 55 दिनों से अनशन कर रहे हैं। उसकी कोई मदद करते तो नेता जी से नहीं बनी, अलबत्ता उसकी खिल्ली उड़ाने का मौका उन्होंने नहीं छोड़ा। नेता भी ऐरा-गैरा नत्थूखैरा नहीं था। शरद पवार का भतीजा अजीत पवार था। पवार ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक देशमुख वहां बैठा पानी के लिए आंदोलन कर रहा है। अब बांध में पानी नहीं है नहीं तो क्या पेशाब करके छोड़ें। बेशर्मी यह कि इसके बाद न केवल वे खुद ठहाका लगाते हैं बल्कि उनके चेले चपाटे भी उसमें भरपूर योगदान करते हैं। अपनी तरह के इस अनूठे हास्य रस पर खुद ही मुग्ध होते हुए अजीत पवार आगे बिजली संकट पर भी बोलते हैं। वे कहते हैं कि बिजली नहीं है इसलिए अंधेरा रहता है। अंधेरा रहता है तो लोग खूब ऐश करते हैं। इससे बच्चे ज्यादा पैदा हो रहे हैं। अब बताइए फिल्मी नेता का डायलाग इसके आगे कहां ठहरता है। पटकथा या संवाद लेखक तो यहां तक जाने ेकी सोच भी नहीं सकता। यह काम केवल नेता ही कर सकता है। कार्यकर्ताओं में सामान्य सुधबुध वाले लोग भी थे जो अपने नेता की इस फूहड़ता पर सन्न रह गए। महिला कार्यकर्ताओं के नथुने फूलते पिचकते रहे पर उन्हें खून का घूंट पीकर चुप रह जाना पड़ा। उन्होंने राजनीतिक गुरुओं से सुन रखा है कि पार्टी में हो तभी तक औकात बखत है। बाहर जाओगे तो कुकुर नहीं पूछेगा। अब कुकुर पूछता रहे इसलिए ऐसे नेताओं की कदमबोशी तो करनी ही पड़ेगी। जाते जाते अंग्रेजों ने कहा था कि यह देश अभी लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं है। गलत कहा था। उन्हें कहना चाहिए था कि यह देश कभी भी लोकतंत्र के लायक नहीं हो सकता। जिस तरह का वाकयुद्ध इन दिनों कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रहा है, वह कोई अच्छी उम्मीदें नहीं जगाता।

रानी मधुमक्खी और सोनिया


मधुमक्खियों का टीआरपी एकाएक बढ़ गया है। देश की दोनों राजनीतिक पार्टियां मधुमक्खियों पर शोध कर रही हैं।  कोई मधुमक्खी को देवता बता रहा है तो कोई यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी से रानी मधुमक्खी की तुलना कर रहा है। दरअसल राहुल गांधी ने इसकी उपमा दी थी। उन्होंने कहा था कि एक व्यक्ति के किये इस देश का कुछ नहीं होने वाला, सबको मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने यह बात सीआईआई के समारोह में कही थी। उन्होंने यह भी कहा था कि कोई अगर ऐसी अपेक्षा करता है कि कोई घोड़े पर सवार होकर आएगा और सबकुछ ठीक कर देगा, तो ऐसा नहीं है। शायद उनका इशारा अंग्रेजी उपन्यास के चरित्र ‘रॉबिन हुड’ की तरफ था। इसके तुरंत बाद से मधुमक्खी का छत्ता हॉट टापिक बन गया है। भाजपा को लगा कि टिप्पणी मोदी को लेकर की गई है। उसने विरोध किया। विरोध किया तो कांग्रेस ने तत्काल कहा, राहुल का आशय मोदी नहीं थे। राहुल यदि मोदी के बारे में कह रहे होते तो भैंसे की उपमा देते। भैंसा यमराज का वाहन है।  कांग्रेस ने यह भी कहा कि मोदी पूरे देश में गोधरा को दोहराना चाहते हैं। मोदी ने कहा था कि उन्होंने गुजरात की माटी का कर्ज उतार दिया है और अब देश की बारी है। वह तो गनीमत हुई कि गोधरा, सिख दंगा पर चर्चा आगे नहीं बढ़ी और मामला मधुमक्खी पर आकर टिक गया। मधुमक्खी पर रिसर्च शुरू हो गया। कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि मधुमक्खी एक देवी भी है जिसे भ्रामरी कहा जाता है। उत्तरांचल में इस देवी के मंदिर भी हैं। शोध भाजपा भी कर रही थी। भाजपा ने कहा कि राहुल बाबा ने ठीक ही कहा है। देश एक मधुमक्खी का छत्ता है और सोनिया गांधी रानी मधुमक्खी। हालांकि इस बार सोनिया का नाम नहीं लिया गया। पर यह जरूर कहा गया कि रानी मधुमक्खी खुद कोई काम नहीं करती। काम शेष देशवासी करते हैं जिन्हें साधारण नर मधुमक्खी समझा जा सकता है। यह भी कहा गया कि नर मधुमक्खियों के हाथ कुछ नहीं आता। शहद कोई और पी जाता है।  बहरहाल शोध अभी जारी है। आने वाले कुछ दिनों में हमारे नेता मधुमक्खी का कोई और ऐंगल निकाल लाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तब तक मधुमक्खियां अपने टीआरपी पर इठला सकती हैं।