बहुत पहले एक फिल्म आई थी। नाम तो याद नहीं पर उसमें एक नेता की टिप्पणी याद रह गई। नेता ने कहा था कि यदि नदी के पानी से बिजली निकाल ली गई तो फिर खेतों का क्या होगा? लोगों को लगा था कि फिल्मी लोगों ने नेताओं को नीचा दिखाने के लिए अतिश्योक्ति का उपयोग किया था। पर वास्तव में हकीकत से यह काफी कम था। नेता किस हद तक जा सकते हैं, क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी बानगी देखेंगे तो अकेले में भी शर्मा जाएंगे। प्रभाकर देशमुख नाम का एक शख्स अपने खेतों के लिए पानी की मांग को लेकर पिछले 55 दिनों से अनशन कर रहे हैं। उसकी कोई मदद करते तो नेता जी से नहीं बनी, अलबत्ता उसकी खिल्ली उड़ाने का मौका उन्होंने नहीं छोड़ा। नेता भी ऐरा-गैरा नत्थूखैरा नहीं था। शरद पवार का भतीजा अजीत पवार था। पवार ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक देशमुख वहां बैठा पानी के लिए आंदोलन कर रहा है। अब बांध में पानी नहीं है नहीं तो क्या पेशाब करके छोड़ें। बेशर्मी यह कि इसके बाद न केवल वे खुद ठहाका लगाते हैं बल्कि उनके चेले चपाटे भी उसमें भरपूर योगदान करते हैं। अपनी तरह के इस अनूठे हास्य रस पर खुद ही मुग्ध होते हुए अजीत पवार आगे बिजली संकट पर भी बोलते हैं। वे कहते हैं कि बिजली नहीं है इसलिए अंधेरा रहता है। अंधेरा रहता है तो लोग खूब ऐश करते हैं। इससे बच्चे ज्यादा पैदा हो रहे हैं। अब बताइए फिल्मी नेता का डायलाग इसके आगे कहां ठहरता है। पटकथा या संवाद लेखक तो यहां तक जाने ेकी सोच भी नहीं सकता। यह काम केवल नेता ही कर सकता है। कार्यकर्ताओं में सामान्य सुधबुध वाले लोग भी थे जो अपने नेता की इस फूहड़ता पर सन्न रह गए। महिला कार्यकर्ताओं के नथुने फूलते पिचकते रहे पर उन्हें खून का घूंट पीकर चुप रह जाना पड़ा। उन्होंने राजनीतिक गुरुओं से सुन रखा है कि पार्टी में हो तभी तक औकात बखत है। बाहर जाओगे तो कुकुर नहीं पूछेगा। अब कुकुर पूछता रहे इसलिए ऐसे नेताओं की कदमबोशी तो करनी ही पड़ेगी। जाते जाते अंग्रेजों ने कहा था कि यह देश अभी लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं है। गलत कहा था। उन्हें कहना चाहिए था कि यह देश कभी भी लोकतंत्र के लायक नहीं हो सकता। जिस तरह का वाकयुद्ध इन दिनों कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रहा है, वह कोई अच्छी उम्मीदें नहीं जगाता।
Sunday, 7 April 2013
मुंह को लगाम नहीं
बहुत पहले एक फिल्म आई थी। नाम तो याद नहीं पर उसमें एक नेता की टिप्पणी याद रह गई। नेता ने कहा था कि यदि नदी के पानी से बिजली निकाल ली गई तो फिर खेतों का क्या होगा? लोगों को लगा था कि फिल्मी लोगों ने नेताओं को नीचा दिखाने के लिए अतिश्योक्ति का उपयोग किया था। पर वास्तव में हकीकत से यह काफी कम था। नेता किस हद तक जा सकते हैं, क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी बानगी देखेंगे तो अकेले में भी शर्मा जाएंगे। प्रभाकर देशमुख नाम का एक शख्स अपने खेतों के लिए पानी की मांग को लेकर पिछले 55 दिनों से अनशन कर रहे हैं। उसकी कोई मदद करते तो नेता जी से नहीं बनी, अलबत्ता उसकी खिल्ली उड़ाने का मौका उन्होंने नहीं छोड़ा। नेता भी ऐरा-गैरा नत्थूखैरा नहीं था। शरद पवार का भतीजा अजीत पवार था। पवार ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक देशमुख वहां बैठा पानी के लिए आंदोलन कर रहा है। अब बांध में पानी नहीं है नहीं तो क्या पेशाब करके छोड़ें। बेशर्मी यह कि इसके बाद न केवल वे खुद ठहाका लगाते हैं बल्कि उनके चेले चपाटे भी उसमें भरपूर योगदान करते हैं। अपनी तरह के इस अनूठे हास्य रस पर खुद ही मुग्ध होते हुए अजीत पवार आगे बिजली संकट पर भी बोलते हैं। वे कहते हैं कि बिजली नहीं है इसलिए अंधेरा रहता है। अंधेरा रहता है तो लोग खूब ऐश करते हैं। इससे बच्चे ज्यादा पैदा हो रहे हैं। अब बताइए फिल्मी नेता का डायलाग इसके आगे कहां ठहरता है। पटकथा या संवाद लेखक तो यहां तक जाने ेकी सोच भी नहीं सकता। यह काम केवल नेता ही कर सकता है। कार्यकर्ताओं में सामान्य सुधबुध वाले लोग भी थे जो अपने नेता की इस फूहड़ता पर सन्न रह गए। महिला कार्यकर्ताओं के नथुने फूलते पिचकते रहे पर उन्हें खून का घूंट पीकर चुप रह जाना पड़ा। उन्होंने राजनीतिक गुरुओं से सुन रखा है कि पार्टी में हो तभी तक औकात बखत है। बाहर जाओगे तो कुकुर नहीं पूछेगा। अब कुकुर पूछता रहे इसलिए ऐसे नेताओं की कदमबोशी तो करनी ही पड़ेगी। जाते जाते अंग्रेजों ने कहा था कि यह देश अभी लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं है। गलत कहा था। उन्हें कहना चाहिए था कि यह देश कभी भी लोकतंत्र के लायक नहीं हो सकता। जिस तरह का वाकयुद्ध इन दिनों कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रहा है, वह कोई अच्छी उम्मीदें नहीं जगाता।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment